Wednesday, June 19, 2019

जानिए धारकुंडी के सौंदर्य की महिमा

पहाड़ों से बहती जल की धारा

                         dharkudi baba

कटनी-इलाहाबाद रेल मार्ग में सतना से 70 किलोमीटर दूर धारकुंडी में प्रकृति और अध्यात्म का अनुपम मिलन देखने को मिलता है। सतपुड़ा के पठार की विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित धारकुंडी में प्रकृति की अनुपम छटा देखने को मिलती है। 

पर्वत की कंदराओं में साधना स्थल, दुर्लभ शैल चित्र, पहा़ड़ों से अनवरत बहती जल की धारा, गहरी खाईयां और चारों ओर से घिरे घनघोर जंगल के बीच महाराज सच्चिदानंद जी के परमहंस आश्रम ने यहां पर्यटन और अध्यात्म को एक सूत्र में पिरो कर रख दिया है। यहां बहुमूल्य औषधियां और जीवाश्म भी पाए जाते हैं।

माना जाता है कि महाभारत काल में युधिष्ठिर और दक्ष का प्रसिद्ध संवाद यहीं के एक कुंड में हुआ था जिसे अघमर्षण कुंड कहा जाता है। यह कुंड भूतल से करीब 100 मीटर नीचे है। धारकुंडी मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है। 
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धार तथा कुंडी यानी जल की धारा और जलकुंड। विंध्याचल पर्वत श्रेणियों के दो पर्वत की संधियों से प्रस्फुटित होकर प्रवाहित होने वाली जल की निर्मल धारा यहां एक प्राकृतिक जलकुंड का निर्माण करती है। 




 kund se bahti huidhara

समुद्र तल से 1050 फुट ऊपर स्थित धारकुंडी में प्रकृति का स्वर्गिक सौंदर्य आध्यात्मिक ऊर्जा का अक्षय स्रोत उपलब्ध कराता है। 

यहां जनवरी में जहां न्यूनतम तापमान 2 से 3 डिग्री रहता है वहीं अधिकतम तापमान 18 डिग्री रहता है। जून माह में न्यूनतम 20 डिग्री तथा अधिकतम तापमान 45 डिग्री रहता है। 

योगिराज स्वामी परमानंद जी परमहंस जी के सान्निध्य में सच्चिदानंद जी ने चित्रकूट के अनुसूया आश्रम में करीब 11 वर्ष साधना की। इसके बाद सच्चिदानंद जी महाराज 1956 में यहां आए और अपनी आध्यात्मिक शक्ति से यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को आश्रम के माध्यम से एक सार्थक रूप दिया। उनके आश्रम में अतिथियों के लिए रहने और भोजन की मुफ्त में उत्तम व्यवस्था है।

विशेष है कि महाराज जी अपने खेतों में उपजे अन्न से ही अपने आगंतुकों को भोजन कराते हैं। भागम-भाग भरे जीवन के बीच कुछ दिन यहां आकर व्यक्ति को अध्यात्म और शांति का अनुपम अनुभव हो सकता है। 

 dharkudi ashram

प्रकृति प्रेमी आध्यात्मिक लोग मध्य प्रदेश के सतना से यहां आ सकते हैं। सतना से प्रतिदिन एक बस यहां जाती है। इसके अलावा सतना के बस स्टैंड में स्थित परमहंस आश्रम की शाखा से भी यहां जाने के लिए जानकारी मिल सकती है। घनघोर जंगल, पर्वतों और झरनों के बीच स्थित परमहंस आश्रम में साधना के लिए योगी पुरुषों का आवागमन होते रहता है। 

यहां आकर जीवन ठहर सा जाता है। मन को सुकून मिलता है। यहां के प्राकृतिक सौंदर्य का तो कोई जवाब नहीं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है यहां का परमहंस आश्रम। पूज्य सच्चिदानंद जी के अध्यात्म ने धारकुंडी के सौंदर्य की महिमा को दैवीय बना दिया है। जिसका अनुभव प्रकृति प्रेमी व्यक्तियों को जरूर लेना चाहिए

Tuesday, June 18, 2019

Gaivinath dham BIRSINGHPUR ki mahima

Gaivinath dham BIRSINGHPUR ki mahima

Gaivinath dham birsinghpur
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 मध्यप्रदेश के सतना जिला मुख्यालय से तकरीबन 35 किमी. दूर स्थित गैवीनाथ मंदिर है। यह विंध्यभर में आस्था का केन्द्र बना हुआ है। यहां खंडित शिवलिंग की पूजा होती है। इसका वर्णन पदम पुराण के पाताल खंड में मिलता है। जिसके अनुसार त्रेतायुग में यहां राजा वीर सिंह का राज्य हुआ करता था और तब बिरसिंहपुर नगर का नाम देवपुर था। राजा वीर सिंह प्रतिदिन भगवान महाकाल को जल चढ़ाने घोड़े पर सवार होकर उज्जैन दर्शन करने जाते थे। बताया गया कि लगभग 650 वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। इस तरह राजा वृद्ध हो गए और उज्जैन जाने में परेशानी होने लगी। महाकाल ने देवपुर में दर्शन देने की बात कही एक बार उन्होंने भगवान महाकाल के सामने मन की बात रखी। बताया जाता है, एक दिन भगवान महाकाल ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिया और देवपुर में दर्शन देने की बात कही। इसके बाद नगर के गैवी यादव नामक व्यक्ति घर में एक घटना सामने आई। घर के चूल्हे से रात को शिवलिंग रूप निकलता, जिसे यादव की मां मूसल से ठोक कर अंदर कर देती। राजा ने गैवी यादव को बुलाया कई दिनों तक यही क्रम चलता रहा। एक दिन महाकाल फिर से राजा को स्वप्न में आए और कहा कि मैं तुम्हारी पूजा व निष्ठा से प्रसन्न होकर तुम्हारे नगर में निकलना चाहता हूं, लेकिन गैवी यादव मुझे निकलने नहीं देता। इसके बाद राजा ने गैवी यादव को बुलाया और स्वप्न की बात बताई। जिसके बाद जगह को खाली कराया गया, जहां शिवलिंग निकला।
Gaivinath dham birsinghpur
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पलिंगके रूप में पहचान राजा ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया, महाकाल के ही कहने पर शिवलिंग का नाम गैवीनाथ रख दिया। तब से भोलेनाथ को गैवीनाथ के नाम से जाना जाता है। स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान महाकाल के उपलिंग के रूप में होती है। बोला जाता है, जो व्यक्ति महाकाल के दर्शन करने नहीं जा सकता, वे बिरसिंहपुर के गैवीनाथ भगवान का दर्शन कर लें, पुण्य उतना ही मिलेगा। चारोधाम का चढ़ता है जल पौराणिक मन्यताओं के अनुसार यहां चारोधाम से लौटने वाले भक्त भगवान भोलनाथ के दर गैवीनाथ पहुंचकर चारोधाम का जल चढ़ाते है। पूर्वज बतातें है कि जितना चारोधाम में भगवान का दर्शन करने से पुण्य मिलता है। उससे कहीं ज्यादा गवौनाथ में जल चढ़ाने से मिलता है। लोग कहते है कि चारोधाम का अगर जल यहां नहीं चढ़ा तो चारोधाम की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

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विंध्य क्षेत्र में प्रचलित मंदिर के पुजारी की मानें तो महाशिवरात्रि के दिन विंध्यभर से भक्त पहुंचते है। इसीतरह मनमास के माह में गैवीनाथ की पूजा का अपना एक महत्व है ही। वैसे तो हर सोमवार को हजारों भक्त पहुंचकर गैवीनाथ की पूजाकर मन्नत मांगते है। गैवीनाथ का प्रताप है कि यहां पर आने वाले हर एक भक्त की मनों कामना पूणज़् होती है।



भगवान शंकर के विशेष पूजन के रूप में सोमवार को मनाई जाने वाली वाली महाशिवरात्रि अद्भुत संयोग लेकर आई है। शिवरात्रि पर शिव की आराधना का भक्तों को कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। महाशिवरात्रि के लिए शिव मंदिरों और शिवालयों में तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया है। सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्घालुओं का मंदिरों में पहुंचना शुरू हो जाएगा। शिवरात्रि के दिन कई मंदिरों-शिवालयों में भंडारे की भी व्यवस्था की गई है। शहर के जगतदेव तालाब स्थित शिव मंदिर, कोठी रोड स्थित पशुपतिनाथ मंदिर, बिरसिंहपुर स्थित गैबीनाथ धाम मंदिर में भगवान शिव की पूजा के लिए अच्छी खासी संख्या में श्रद्घालुओं की भीड़ एकत्रित होती है। इन विशेष स्थानों में भक्तों की सुरक्षा के लिए पुलिस की भी व्यवस्था की जाती है, ताकि किसी प्रकार की घटना न घटित हो सके। इसके साथ ही साफ-सफाई की भी व्यवस्था की गई है।



लाखों की संख्या में आएंगे श्रद्घालु


बिरसिंहपुर का गैबीनाथ मंदिर पूरे प्रदेशभर में प्रसिद्घ है। यहां पर भगवान शंकर की शिवलिंग के दर्शन के लिए रोजाना हजारों श्रद्घालु पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर गैबीनाथ मंदिर में लाखों की संख्या में श्रद्घालु दर्शन-पूजन के लिये पहुंचते हैं। गैबीनाथ का मंदिर कई वर्षों पुराना है। ऐसी मान्यता है कि गैबीनाथ के दर्शन-पूजन करने से लोगों का कष्ट दूर होता है। इसीलिए यहां पर लोगों की भीड़ लगी रहती है। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने से लोगों को प्रेत-बाधा व बुरी आत्माओं से मुक्ति मिलती है।



कन्याएं रखेंगी व्रतमहाशिवरात्रि के दिन कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए पूरा दिन व्रत रखती हैं और विशेष पूजा अर्चना करती हैं। इस दिन व्रती को फल, पुष्प, चंदन, बेल पत्र, धतूरा, धूप, दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिव को स्नान कराकर जल से अभिषेक करें। महाशिवरात्रि पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु शिव मंदिरों में जाकर भगवान शंकर की पूजा करते हैं। 4 मार्च को मनाए जा रहे महाशिवरात्रि पर्व पंचग्रही व शिव योग में मनाया जाएगा। इस दिन कुंभ राशि में सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र व केतु का मिलन होगा जिससे इसकी मान्यता और भी बढ़ जाती है।

कालसर्प योग शांति के लिए वरदान है महाशिवरात्रि

शिवपुरांण के अनुसार महाशिवरात्रि को भूतभावन सदाशिव महाकालेश्वर भगवान शिव और प्रजापति दक्ष की कन्या सती का विवाह हुआ था, अतः शिव और सती के मिलन की रात्रि है महाशिवरात्रि। शिव का शाब्दिक अर्थ है कल्याणकारी । अतः महाशिवरात्रि का अर्थ हुआ महान कल्याणकारी रात्रि। तिथियों में चतुदर्शी के स्वामी भगवान शिव हैं। यह तिथि उनकी प्रिय तिथि है।